ईशावास्यम् · अध्याय-सार
From ईश उपनिषद्, taught by Acharya T Krishnatrey. This lesson is free to read.
<pre data-block="statement">इन मन्त्रों में | आरम्भिक तीन मन्त्र सम्पूर्ण स्वर स्थापित करते हैं। मन्त्र 1 उपनिषद् का हृदय देता है : सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रभु से व्याप्त है, अतः त्याग से भोग करना चाहिए और कुछ भी लोभ नहीं करना चाहिए। मन्त्र 2 इसे कर्म से सन्तुलित करता है — अपना कर्म करो, पूरे सौ वर्ष जीने की इच्छा करो, और ठीक से किया गया कर्म बाँधता नहीं। मन्त्र 3 चेताता है कि जो अज्ञान में जीकर आत्मा का "हनन" करते हैं, वे आनन्दहीन, अन्धकारमय लोकों में गिरते हैं।</pre>