आत्मन् · अध्याय-सार

From ईश उपनिषद्, taught by Acharya T Krishnatrey. This lesson is free to read.

<pre data-block="statement">इन मन्त्रों में | उपनिषद् के दर्शन का हृदय। मन्त्र 4–5 आत्मा को विरोधाभास से वर्णित करते हैं : अचल फिर भी मन से तीव्रगामी, दूर फिर भी निकट, सबके भीतर और सबसे परे। मन्त्र 6–7 उसके साक्षात्कार का व्यावहारिक फल देते हैं : जो आत्मा को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है, वह किसी से घृणा नहीं करता, और एकत्व-दर्शी के लिए न मोह रहता है न शोक। मन्त्र 8 इस खण्ड को उस शुद्ध, स्वयम्भू द्रष्टा के चित्र से मुकुटित करता है जो सबका विधान करता है।</pre>


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