काण्ड १ · अध्याय-सार

From कृष्ण यजुर्वेद — तैत्तिरीय संहिता, taught by Acharya T Krishnatrey. This lesson is free to read.

<pre data-block="statement"> प्रथम काण्ड समस्त यजुर्वेद को खोलता है और नित्य कर्मों को प्रस्तुत करता है : दर्श-पूर्णमास (अमावस्या-पूर्णिमा की आहुतियाँ), सोम का क्रय और अभिषव, चातुर्मास्य (ऋतु-कर्म), और राजसूय की पूर्व-क्रियाएँ। इसके मन्त्र दो स्थानों पर एकत्र हैं। प्रपाठक १ कर्म के आरम्भ देता है — वेद के प्रथम शब्द (इषे त्वा, १.१.१), गौओं का आशीर्वाद, कुश का बिछाना, और सवितृ की प्रेरणा का वह महान् सूत्र जो प्रत्येक वैदिक कर्म की भूमिका है। प्रपाठक ८ ऋतु-कर्म और रुद्र-सामग्री देता है — पाप की व्यापक स्वीकारोक्ति (१.८.३), मन का पुनराह्वान (१.८.५), यह विस्मयकारी घोषणा कि रुद्र एक ही है (१.८.६), और त्र्यम्बक मन्त्र (१.८.६) जिसे संसार महामृत्युञ्जय के नाम से जानता है। इसके ग्यारह मन्त्र आगे हैं। वे अन्न और गौओं से सूर्य तक, वेदी से मृत्यु की सीमाओं तक जाते हैं। </pre>


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