काण्ड २ · अध्याय-सार

From कृष्ण यजुर्वेद — तैत्तिरीय संहिता, taught by Acharya T Krishnatrey. This lesson is free to read.

<pre data-block="statement"> दूसरा काण्ड काम्येष्टि की ओर मुड़ता है — "कामना की आहुतियाँ"। जहाँ काण्ड १ ने नित्य कर्मों का पंचांग दिया, वहाँ काण्ड २ वैकल्पिक कर्म देता है : वे यज्ञ जो इसलिए किए जाते हैं क्योंकि कोई कुछ चाहता है — संघर्ष में सुरक्षा, वर्षा, गौएँ, सन्तान, क्षमा, दीर्घ और समृद्ध जीवन। काण्ड का बहुत भाग ब्राह्मण-गद्य है जो बताता है कि कौन-सी आहुति किस कामना के अनुकूल है। परन्तु प्रत्येक प्रपाठक के अन्त में एक अनुवाक खड़ा है जो आवाहन-ऋचाएँ (पुरोनुवाक्या और याज्या) संचित करता है — और वही कविता है। उन्हीं से निम्नलिखित मन्त्र आते हैं : संग्राम के मध्य पुकारे गए इन्द्र; प्रत्येक महादेव अपने गण के साथ; हिरण्यपाणि सविता; प्रसिद्ध गणपति/ब्रह्मणस्पति आवाहन; रक्षक सोम; भव्य सूर्य श्लोक — "मित्र, वरुण और अग्नि का चक्षु"; और बिछी कुश पर बुलाए गए विश्वे देवाः। इनमें से बारह आगे हैं — वेद स्पष्टता से और बिना संकोच जीवन की शुभ वस्तुओं की प्रार्थना करता हुआ। </pre>


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