अध्याय १–१० · अध्याय-सार

From शुक्ल यजुर्वेद — वाजसनेयि संहिता, taught by Acharya T Krishnatrey. This lesson is free to read.

<pre data-block="statement"> प्रथम दस अध्याय वैदिक वर्ष की साधारण, पुनरावृत्त उपासना धारण करते हैं। अध्याय १–२ दर्शपूर्णमास देते हैं, और उनके साथ वेद के प्रथम शब्द तथा व्रत का ग्रहण और विसर्जन। अध्याय ३ अग्निहोत्र — नित्य अग्नि-आहुति — और चातुर्मास्य देता है, जहाँ त्र्यम्बक मन्त्र स्थित है। अध्याय ४–८ सोम-यज्ञ को सोम के क्रय से लेकर सत्र के उन्नत समापन तक ले चलते हैं। अध्याय ९–१० वाजपेय और राजसूय, राजकीय कर्म देते हैं। इनके बारह मन्त्र आगे हैं। एक युगल पर ध्यान दीजिए जो सब कुछ बाँधता है : व्रत "असत्य से सत्य की ओर जाता हूँ" कहकर लिया जाता है, और "जो मैं वस्तुतः हूँ वही हूँ" कहकर छोड़ा जाता है। </pre>


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