अध्याय ११–१८ · अध्याय-सार
From शुक्ल यजुर्वेद — वाजसनेयि संहिता, taught by Acharya T Krishnatrey. This lesson is free to read.
<pre data-block="statement"> ये आठ अध्याय अग्निचयन धारण करते हैं — महान् अग्नि-वेदी का चयन, वेद का सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी कर्म। एक सहस्र से अधिक इष्टकाओं की पक्षी-आकार वेदी अनेक मासों में बनाई जाती है, और प्रत्येक इष्टका अपने मन्त्र सहित रखी जाती है। अध्याय ११ भूमि और उखा (मिट्टी का अग्नि-पात्र) तैयार करता है — और मन के जुड़ने से आरम्भ होता है। अध्याय १२–१५ स्तर-दर-स्तर इष्टकाएँ रखते हैं। अध्याय १७ वेदी पूर्ण कर उस पर चढ़ता है। अध्याय १८ महान् वाज-सूची से समाप्त होता है, चमकम् का शुक्ल समकक्ष, जो आयु से वाणी तक और स्वयं यज्ञ तक सब कुछ "यज्ञ से ठीक हो" माँगता है। इनके बारह मन्त्र आगे हैं। सोलहवाँ अध्याय भी इसी विस्तार का है — पर वह शतरुद्रीय है, और इतना महान् कि अगला अध्याय पूरा उसी का है। </pre>