अध्याय ३३–३९ · अध्याय-सार

From शुक्ल यजुर्वेद — वाजसनेयि संहिता, taught by Acharya T Krishnatrey. This lesson is free to read.

<pre data-block="statement"> ये सात अध्याय समस्त वेद के दो सर्वाधिक प्रिय अंश धारण करते हैं। अध्याय ३४ शिवसङ्कल्प सूक्त है — मन पर छह मन्त्र, प्रत्येक एक ही टेक से समाप्त : तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु, "मेरा वह मन शिव-सङ्कल्प वाला हो।" और कहीं वेद मन को इतने निकट से नहीं देखता, न इतनी सरलता से उसके शुभ होने की प्रार्थना करता है। अध्याय ३५ पितृमेध है; ३६–३९ प्रवर्ग्य और उसकी शान्ति-सामग्री धारण करते हैं — जिनमें शं नो मित्रः (३६.९), महान् द्यौः शान्तिः शान्ति-पाठ (३६.१७), मित्र की दृष्टि से देखे जाने की प्रार्थना (३६.१८), और वह आशीर्वाद जिसे प्रत्येक हिन्दू जानता है : पश्येम शरदः शतम् (३६.२४)। तेरह मन्त्र आगे हैं, शिवसङ्कल्प के छहों से आरम्भ। </pre>


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