अध्याय ४० · अध्याय-सार

From शुक्ल यजुर्वेद — वाजसनेयि संहिता, taught by Acharya T Krishnatrey. This lesson is free to read.

<pre data-block="statement"> 🕉️ कर्म का वेद आत्मज्ञान में समाप्त होता है। वाजसनेयि संहिता का चालीसवाँ और अन्तिम अध्याय ईशावास्य उपनिषद् है — वह एकमात्र उपनिषद् जो किसी वेद से जोड़ी नहीं गई, अपितु एक वेद के भीतर, उसके समापन अध्याय के रूप में खड़ी है। प्रत्येक पारम्परिक सूची में यह प्रमुख उपनिषदों में प्रथम है, और अपने प्रथम दो शब्दों से नाम पाती है। उनतालीस अध्यायों की आहुतियों, इष्टकाओं और नमस्कारों के बाद, ग्रन्थ मुड़कर कहता है : यह सब ईश से आच्छादित है; त्याग से भोगो; किसी के धन का लोभ मत करो। फिर वह उन दो वस्तुओं को साथ थामता है जिन्हें शेष सब अलग करते हैं — कर्म और ज्ञान, प्रकट और अप्रकट — और किसी को छोड़ने से इनकार करता है। इसके अठारह में से दस मन्त्र आगे हैं। (विद्यासेतु पर केवल इसी उपनिषद् का एक स्वतन्त्र पाठ्यक्रम भी है।) </pre>


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